मैं कहता सुरझावनहारी

आज मैं आपके समक्ष मनु -स्मृति लेकर आई हूं। जिसमें आक्रांताओं के प्रभाव में हमारे ही पंडितों और पुरोहितों ने इतनी मिलावट कर दी है कि उसे जाति विशेष का पोषक माना जाता है। संस्कृत भाषा के मर्म को जानने के कारण मुझे इस के कथनों में विरोधाभास स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है। कारण … Continue reading मैं कहता सुरझावनहारी

सच्चिनंद हीरानंद वात्स्यायन (अज्ञेय)

‘ शेखर एक जीवनी ' , ' नदी के द्वीप ' , ' अपने अपने अजनबी ' , हरी घास पर क्षण भर ’ , ‘ कितनी नावों में कितनी बार ' जैसी प्रमुख कृतियों के रचनाकार सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘ अज्ञेय ' का जन्म 7 मार्च 1911 को उत्तर प्रदेश के कुशीनगर जिले में … Continue reading सच्चिनंद हीरानंद वात्स्यायन (अज्ञेय)

बसंत – एक उपहार

प्रकृति के दूत, फिर ले आए उपहार ; बहुत छोटा उपहार पर गहरा प्यार। नव किसलय मंजुल कलियां नई शाखाएं सजी बेलों की , तरह-तरह की चहचहाहट - मेरे खग कुल की , सब में रचा-बसा प्यार गहरा।।

राजे  अपनी रखवाली की

The imitative poet who aims at being popular is not by nature made, nor is his art intended, to please or to affect the rational principle in the soul ; but he will prefer the passionate and fitful temper, which is easily limited.... -Plato राजे अपनी रखवाली की; किला बनाकर रहा; बड़ी- बड़ी फौजें रखीं। … Continue reading राजे  अपनी रखवाली की

हे मां भारती शत—शत नमन तुम्हें

हे मां भारती शत - शत नमन तुम्हें! उर का हर स्पंदन करे नमन तुम्हें! तेरी गोद मुझे हर जनम मिले ओढूं तेरा बसंती बाना। हे जगवंदिनी शत - शत नमन तुम्हें! राग - द्वेष से परे नेह से भरे हुए अपने पुत्रों को तूने सदा दुलारा। हे तपसिंधुनी शत - शत नमन तुम्हें! रसमयी … Continue reading हे मां भारती शत—शत नमन तुम्हें